उत्तर प्रदेश । राजनीति, चुनावी वादों और नेताओं के व्यवहार पर कटाक्ष करती कविता “राजनीति के किरदार” इन दिनों एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश सामने रखती है। कविता में राहत, विकास, चुनावी वादों और जनता से वोट मांगने के दौरान नेताओं के बदलते व्यवहार को व्यंग्यात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।
कविता में कहा गया है कि चुनाव के समय नेता जनता के बीच पहुंचते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं और समर्थन मांगते हैं, लेकिन मतदाताओं को किसी भी निर्णय से पहले उनके कामकाज और वादों की सच्चाई को परखना चाहिए।
इस रचना के माध्यम से आगामी 2027 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए मतदाताओं से जागरूक होकर मतदान करने की अपील की गई है।
कविता — राजनीति के किरदार
राहत को राहे तके,
घटा भयो घनघोर।
आके हाथ जो पकड़ लियो,
तो मन भयो विभोर।
दिल में तेरी छवि बनाए,
बैठे हैं किशोर।
आफ़त में जब फँस रहे,
तब गाँव करे बड़ी शोर।
एक बार न दरस दियो,
क्षेत्र के मुखिया मोर।
चुनाव के जब टाइम दिखे,
गूँजे ज़िंदाबाद के शोर।
वोट माँगने जब पहुँचे,
तब गिरें गोड़ पर मोर।
भईया तब हम कह उठे—
नैन से बहे बड़ी लोर।
इससे थोड़ा बचके रहना,
ये नेता, नहीं यह चोर।
जब मिले हाथ जोड़कर,
लाठी मारो बिजोर!
संदेश स्पष्ट है कि केवल नारों, प्रचार और वादों के आधार पर नहीं, बल्कि विकास कार्यों, जनहित और उम्मीदवार के व्यवहार को देखकर अपना प्रतिनिधि चुनना चाहिए।
कविता के अंत में ये नेता, नहीं यह चोर” जैसी पंक्तियों के जरिए चुनावी राजनीति पर तीखा व्यंग्य किया गया है। यह कविता लेखक अतुल कुमार भट्ट के नाम से प्रस्तुत है।
संदेश: लोकतंत्र की मजबूती जागरूक मतदाताओं से आती है। मतदान से पहले सोचें, सवाल पूछें और अपने विवेक के आधार पर सही प्रतिनिधि चुनें।
प्रस्तुति: News India Prime — सच के साथ

